धुआँ का जेन्डर आइडेंटिफिकेशन – featuring Indian Society.

हम जब ये कहते हैं कि समाज अब स्त्री – पुरुष के बीच कोई असमानता नहीं करता, और सबको बराबर समझता है तब एक विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होती है । क्या हम ये कहकर खुद से झूठ नहीं बोल रहे होते? यदि ऐसा नहीं है तो किसी एक कृत्य  के लिए दोनों के लिए अलग मापदंड क्यों रखा जाता है? 2020 में भी भारत में महिलाओं द्वारा स्मोकिंग एक टैबू हीं माना जाता है।
यदि पुरुष सड़क पर सिगरेट पिए तो वह उसका अधिकार या उसकी पसंद समझ ली जाती है वहीं अगर कोई स्त्री सिगरेट पिए तो उसे चरित्रहीन होने का तमगा मिल जाता है? क्यों जब दोनो एक ही काम कर रहे हैं तो उनके गलत या सही होने का पैमाना अलग हो जाता है ?

Smoking indian girl hd pic
Image courtesy :Nagarjun Kandukuru

          क्यों हम सही को सही और ग़लत को गलत कहने में समानता नहीं रखते? पुरुष सबके सामने धूम्रपान करने में ज़रा भी संकोच नहीं करते और लोग भी उन्हें किसी बुरे नजरिए से नहीं देखते।लोगों को यह आम बात लगती है जैसे पुरुषों का मदिरा सेवन करना आदि। वहीं जब कोई महिला सबके सामने अगर नशा करे तो सब उसे घृणित नज़रों से देखते हैं या ये कहें कि । उदाहरण के तौर पर अगर आप सिगरेट नहीं भी पीते हैं तो आप किसी वाक्ये की कल्पना करें कि कभी सिगरेट की दुकान पर अचानक एक युवती आ कर बोले, ‘भईया एक मार्लबोरो।’ बस! फ़िर क्या है, पृथ्वी सूर्य का चक्कर काटना बंद कर देगी, समंदर थम जाएगा, और धरती वायु विहीन हो जाएगी। वहाँ खड़े लोग उस युवती को उसके हील के पॉइंट से उसके ललाट तक उसके ऐसे देखेंगे जैसे पाताल लोक का कोई प्राणी ऊपर अचानक से हवा खाने आया हो!

हालाँकि एक पहलू यह भी है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं सदियों से बीड़ी पीते आयीं है पर उस वक़्त इसे चरित्र से नहीं जोड़ा गया। हम से कई लोग आज भी गाँवों में यह देखते होंगे। पर शहरीकरण के इस दौर में यह एक ‘आदत’ से कब ‘चरित्र निर्माण’ का आधार बन गया हमें पता भी नहीं चला।

Image courtesy : Parivartan Sharma – Reuters

वहीं दूसरी ओर WHO(वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन) की एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं का धूम्रपान करना शहरी उच्च वर्ग में ज्यादा देखा गया है । जो दर्शाता है कि महिलाएं ऐसा पुरुषों के समकक्ष होने के लिए करतीं हैं । भारत में लगभग एक करोड़ से ज्यादा महिलाएं धूम्रपान करती हैं । हालांकि धूम्रपान करने वाली महिलाओं में पिछले कुछ दशकों में वृद्धि देखी गई है जो पुरुषों के धूम्रपान के वृद्धि दर से अधिक है। इन बातों को बताने का मकसद धुम्रपान का महिमामंडन करना नहीं है ब्लकि आपका नज़र उस ओर ले जाना है जहां इसे महिलाओं के चरित्रचित्रण का कारण बनाया जाता है। निःसंकोच धुम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकर है पर यह पितृसत्तात्मक समाज धुम्रपान करने वाली महिलाओं को समाज के लिए हानिकारक समझने लगा है;जो कि ग़लत है।
शोधों में पाया गया कि  फिल्मी पर्दे पर  दर्शाया जाता है कि महिलाएं शराब या धूम्रपान पुरुषों के बराबर होने या अपनी भावनाओं को वश में करने के लिए ऐसा करती हैं । कुछ महिलाएं अपने आप को स्वतंत्र और ताकतवर दिखाने के लिए भी ऐसा करती हैं । वहीं दूसरी तरफ शराब या धूम्रपान करने वाले पुरुषों को फिल्मी पर्दे पर ताकतवर दिखाने के लिए उन्हें धूम्रपान या शराब पीते दिखाया जाता है । कारण जो भी हो, सिगरेट चरित्र निर्माण का आधर न है न होना चाहिए।

By, Pratiksha Kumari

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here