कोरोना लॉक डाउन में सेक्स वर्कर्स का ‘रोज़गार’ कैसा चल रहा? क्या हो पा रहा है इनका जीवन यापन?

कोरोना संक्रमितों कि संख्या बढ़ते देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने लॉकडाउन के पहले देश को संबोधित करते हुए कहा कि अगर हम 21 दिन इस लॉकडाउन को नहीं मानेंगे तो देश 21 साल पीछे चला जाएगा। 21 दिन से शुरू हुआ लॉकडाउन धीरे-धीरे 2-3 महीने तक लगातार चला।इस समय दुनिया के लगभग सभी देश आर्थिक मंदी झेल रहा है और इस मंदी का शिकार देश के हर तबके के लोगों पर बिना भेदभाव के पड़ा है।

सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना उन महिलाओं को करना पड़ा जो एक ऐसे जगह से आती हैं जहां छोटी गलियां, अंधेरे और तंग कमरे में चार पांच महिलाएं अपना जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, जिनकी रोजमर्रा की जरूरतें भी ठीक तरीके से पूरी नहीं हो पाती। इसके लिए उनसभी को किसी और पर निर्भर रहना पड़ता है। हम बात कर रहे हैं यौन कर्मियों कि जिन्हें हम सेक्स वर्कर के नाम से भी जानतें हैं। सेक्स वर्कर रोज कमाती और रोज खाती हैं। अगर एक दिन कमाई ना हो तो पूरे परिवार का जीवनयापन का संकट आ जाने वाली स्थिति उत्पन्न हो जाती है। नेशनल एंड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन (NAGO) की मानें तो देश में तकरीबन 30 लाख सेक्स वर्कर है। उसमें भी भारत में सेक्स वकर कि संख्या 6,37,500 है और 5 लाख ऐसी है जो आज भी इस काम से जुड़ी हैं।

क्यों जाते हैं यौनकर्मियों के पास पुरुष?

यौनकर्मियों के पास जाने वाले पुरुषों के पास अपने अपने तर्क होते हैं जैसे कुछ के लिए सेक्स एक नशा है। कुछ अपने नीरस वैवाहिक जीवन से खुश नहीं होते। कुछ एकाकी जीवन की नीरसत्ता से हटने के लिए तो वहीं कुछ अपने वैवाहिक जिंदगी की जटिलताओं से बचने के लिए।पुणे बुधवर पथ में स्थित आशा केयर टषट ऑगनाइजेसन यौनकर्मियों के कल्याण के लिए बनाई गई एक संस्था है। इस संस्था के आसपास 3000 यौन कर्मियों काम करती हैं। इस ऑर्गनाइजेशन के द्वारा किया गया एक सर्वे जिसमें 300 यौन कर्मियों की प्रतिक्रिया शामिल है जिसमें 82% महिलाएं 25-45 उम्र की है। लॉकडाउन की वजह से ऐसे जगह पर पुरुषों का आना कम हो गया है जिससे इन महिलाओं का जीवन थम सा गया है और अभी कुछ दिनों तक सामान्य होने की स्थिति नज़र भी नहीं आ रही। इसीलिए इस क्षेत्र से जुड़ी 85% महिलाओं ने अपना जीविका चलाने के लिए लोन लेना पड़ा है। तो वहीं 98% महिलाएं अपने मालिक, प्रबंधकों और साहूकारों से कर्ज लेने के लिए मजबूर थीं। तब सवाल यह है कि जो महिलाएं सेक्स वर्किंग से जुड़ी हैं, उनकी मदद कौन करेगा? प्रधानमंत्री केयर फंड से अब तक लगभग 65 सौ करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन क्या यह पैसे सभी नागरिकों के लिए था?  तो हमारी सरकारें इनके लिए आखिर क्या कर रही हैं, क्या यह भी समाज का हिस्सा नहीं है? इनका वजूद किसी के लिए मायने नहीं रखता? इस व्यापार में आने के बाद क्या दुनिया उन स्त्रियों से उनके इंसान होने का हक छीन लेती है?

सेक्स वर्कर क्यों बनना पड़ता है महिलाओं को?

कुछ कॉलेज में जाने वाली लड़कियों के लिए जो अपने भौतिक सुख सुविधाओं और समाज में अपने आप को बेहतर दिखाने के लिए यह क्षेत्र चुनती है, इस व्यावसाय के दलदल में फंसती चलीं जातीं हैं । ज्यादातर महिलाएं अपने और अपने परिवार का जीविका चलाने के लिए इस क्षेत्र में आने को मजबूर रहतीं हैं क्योंकि वे कम पढ़ी-लिखी या अशिक्षित होतीं हैं। और बहुत सारी ऐसी लड़कियां हैं जो कभी वह किसी अपनों द्वारा छली जाती हैं तो कभी धोखे के कारण इस क्षेत्र में धकेल दीं जातीं हैं।ऐसे व्यापार की 84% महिलाएं हाई स्कूल क्या है,जानतीं तक नहीं हैं। उन्हें इस व्यापार में छोटी उम्र में ही किसी अपने द्वारा धकेल दिया जाता है और यह एक ऐसा दलदल है जिससे जाने के बाद निकल पाना बहुत मुश्किल या असंभव है । सामाजिक दूरी ऐसी महिलाओं के लिए सबसे बड़ी परेशानी है क्योंकि यह सभी जिस जगह से आती हैं वहां की गलियां संकरी होती है।स्वच्छता  ऐसी महिलाओं के लिए दूसरी बड़ी दिक्कत है क्योंकि यह जहां पर रहती हैं वहां एक ही शौचालय में 20 औरतें – महिलाएं एक साथ आती जाती हैं। समाज ऐसी महिलाओं को स्वीकार नहीं करेगा जिस कारण यह महिलाएं अपने घर भी नहीं जा सकती।मानसिक परेशानी ऐसी महिलाएं दिन प्रतिदिन डिप्रेशन- एंजाइटी की शिकार होती जा रही हैं क्योंकि इनके पास कोई काम करने के लिए नही है ।कोरोना महामारी के खत्म होने के बाद भी इनका जीवन सामान व्यतीत नहीं होगा क्योंकि संक्रमण का खौफ ख़त्म होने में अभी वक़्त लगेगा। यह बात वे भी जानतीं हैं। इसी कारण से वह अपनी जीविका आराम से चलाने के लिए आगे की रोजगार तलाशने में लगी हैं।

By, Kalyani Singh

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