Contempt of Court मामले में भूषण पर लगा 1 रुपये का जुर्माना,जानिए उनकी तुलना महात्मा गाँधी से क्यों नहीं होनी चाहिए

जुर्माना अदा करने की सहमति देकर प्रशांत भूषण ने दिखाया है कि वे गाँधी नहीं है, सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना करने वाले भूषण ने केवल न्याय को परिभाषित किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना मामले में सीनियर वकील प्रशांत भूषण पर एक रुपए का जुर्माना लगाया है। फैसला आने के बाद प्रशांत भूषण के वकील राजी धवन ने उन्हें एक रुपए का सिक्का जुर्माना भरने को दिया है। जिसे भूषण ने स्वीकार कर लिया है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि,

“मामला कभी भी मेरे बनाम सुप्रीम कोर्ट नहीं था और उससे भी ज़्यादा मेरे बनाम कोई जज नहीं था। जब सुप्रीम कोर्ट जीतता है तो प्रत्येक भारतीय जीतता है। एक संस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट की मैं बहुत सम्मान करता हूं।मैं इसे उम्मीद के आखिरी स्तंभ के रुप में देखता हूँ।”

हालांकि, इससे पहले प्रशांत भूषण ने अदालत के फैसले को नहीं मानने की कसम खाई थी और मुख्य न्यायाधीश एस.ए.ओबडे के खिलाफ किए गए ट्वीट के लिए माफ़ी मांगने से इंकार कर दिया था।

प्रशांत भूषण के समर्थक उनकी तुलना महात्मा गाँधी और नेल्सन मंडेला से करने की हद तक जा चुके थे। हालांकि उन्होंने अपने समर्थकों से इस तरह की तुलना न करने के लिए कहा।
बाद में, उन्होंने एक लेख साझा किया कि कैसे गाँधीजी ने माफ़ी मांगने से इंकार कर दिया था और इस अवमानना का सामना करने का फैसला किया।
बात, 18 अप्रैल 1917 की है जब गाँधीजी मोतिहारी जिला अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए। उन्होंने कहा कि वो चंपारण किसानों के निमंत्रण पर आये है, जिन्होंने आग्रह किया था कि उनके साथ ब्रिटिश इंडिगो प्लांटस द्वारा उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा है, समाजसास्त्र के प्रोफेसर शोभाकांत चौधरी (एमएस कॉलेज, मोतिहारी) ने इस बात को याद दिलाते हुए कहा कि महात्मा गाँधी को 100 रुपये का भुगतान करने के लिए कहा गया था जो उन्होंने देने से इंकार कर दिया था।
इसके बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा मुकदमा वापस ले लिया गया। लोगों ने उनका जय-जयकार किया तथा उन्हें सलाम किया।
हालांकि , अपने सार्वजनिक प्रदर्शन के बावजूद, प्रशांत भूषण ने अंत में, अदालत के फैसले को स्वीकार करने का फैसला किया।

By, Akanksha Kumari

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