जानिए छठ पूजा से जुड़े कुछ Must Know फैक्टस्

छठ पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाता है। यह हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है,जिसे मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा नेपाल में मनाया जाता है। धीरे- धीरे यह पर्व भारत सहित विश्वभर में प्रचलित हो गया है।

छठ पूजा बिहारियों का सबसे बड़ा त्योहार है। बिहार में इसे बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। यह एक ऐसा पर्व है जो वैदिक काल से चला आ रहा है तथा बिहार के लोगों के लिए उनकी संस्कृति बन चुका है। भारत में यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। पहली चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाया जाता है, जिसे चैती छठ के नाम से जाना जाता है तथा दूसरी कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाया जाता है जिसे कार्तिकी छठ कहा जाता है। यह त्योहार चार दिनों की अवधि का होता है। जिसे स्त्री, पुरूष, बूढ़े, जवान सभी लोग करते है।

छठ पूजा की शुरुआत कैसे हुई ?
छठ पर्व का इतिहास बहुत पुराना रहा है। इसकी शुरुआत को लेकर अलग- अलग पौराणिक कथा में अलग-अलग बातें कही गई हैैं :
1. राजा प्रियवंद ने संतान प्राप्ति के लिए की थी छठ पूजा:
एक कथा के मुताबिक राजा प्रियवंद की कोई संतान नही था। इसलिए वे बहुत दुःखी रहते थे। उन्होंने इस बारे में महार्षि कश्यप को बताया। संतान प्राप्ति के लिए महार्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। जिसके बाद राजा प्रियवंद की पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन वह मृत पैदा हुआ था। राजा प्रियवंद मृत पुत्र के शव को लेकर श्मशान गये और वहाँ पुत्र वियोग में अपना प्राण त्यागने लगे। तभी वहां ब्रम्हा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुई। उन्होंने कहा कि मैं सृष्टि के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूं। इसलिए मुझे षष्ठी के भी नाम से जाना जाता है। तुम मेरी पूजा करो। तुम्हें पुत्र की प्राप्ति जरूर होगी। राजा प्रियवंद ने पूरे विधि-विधान से षष्ठी की पूजा की और उन्हें कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ पूजा मनाया जाता है।

2. दानवीर कर्ण ने शुरू की सूर्य उपासना :
एक मत के अनुसार छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य देव के परम भक्त थे। वे घंटों कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया करते थे। तब से ही अर्घ्य दान की पद्धति की शुरुआत हुई और आज भी चलती आ रही है।

3. द्रौपदी ने भी किया था छठ व्रत :
एक कथा के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत द्रौपदी ने किया था। उन्होंने पांडवों के स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन के लिए यह व्रत किया था। जिसके फलस्वरूप पांडवों को उनका खोया हुआ राजपाट वापस मिला था।

4. श्रीराम और सीता ने भी किया था छठ पर्व :
एक कथा के अनुसार छठ पर्व की शरुआत रामराज्य में की गई थी। लंका पर विजय पाने के बाद श्रीराम और सीता ने कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्टी को उपवास रखा था तथा सूर्य देव की पूजा की। तभी से छठ पूजा मनाया जाता है।

छठ पूजा किस तिथि को मनाया जाता है ?
यह पर्व दिपावली के छ: दिन बाद से शुरू होता है और चार दिनों तक चलता है। इस पर्व में चार दिनों तक सूर्य की उपासना की जाती है। छठ पूजा में व्रत रखने वाले व्रतधारी 36 घण्टे तक उपवास रखते है।

नहाय खाय से शुरू होता है यह व्रत :
छठ पूजा की शुरुआत नहाय- खाय से होता है। व्रत के पहले दिन लोग अच्छे से अपने घरों की सफाई करते है तथा नहा- धोकर कद्दू की सब्जी के साथ चावल- दाल खाते है।

खरना के दिन बाँटा जाता है प्रसाद :
छठ पूजा के दूसरे दिन व्रतधारी पूरे दिन उपवास रखते है तथा शाम में खाना खाते है। इसे ही खरना के नाम से जाना जाता है। खरना के दौरान भोजन में नमक का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है। खरना के रस्म के दौरान पड़ोसीयो तथा जान- पहचान वाले को प्रसाद खाने के लिए बुलाया जाता है।

डुबते सूर्य को दिया जाता है अर्घ्य :
छठ पूजा का तीसरा दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी को पड़ता है। इस दिन व्रतधारी अपने हाथों से पूजा के लिए ठेकुआ बनाते है तथा शाम में किसी नदी या तालाब में खड़े होकर डुबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते है। इस दौरान बांस से बनी हुई सूप में आटा से बना हुआ ठेकुआ तथा फल एवं सब्जियों को रखा जाता है। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देके, छठी मईया को प्रसाद अर्पण किया जाता है।

चौथे दिन समाप्त होती है छठ पूजा:
छठ पूजा का अंतिम दिन कार्तिक मास के सप्तमी को पड़ता है। जिसमें व्रतधारी सूर्य निकलने से पहले नदी या तालाब में खड़े रहते है और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते है। इसके बाद व्रतधारी छठी मईया के स्थान पर ही प्रसाद का सेवन करते है।

व्रतधारी के लिए कठिन होता है छठ व्रत :
छठ पर्व व्रतधारियों के लिए बहुत कठिन होता है। इसमें उन्हें अपने सारे सुख सुविधाओं को त्यागना पड़ता है। व्रत के दौरान जमीन पर चादर बिछाकर सोना पड़ता है तथा उपवास के दौरान पानी तक का भी सेवन नहीं किया जाता है।

छठ पूजा में लोक गीत जाए जाते है :
छठ पूजा में प्रसाद बनाते समय,खरना के समय, अर्घ्य देते समय अनेक प्रकार के लोकगीत गाये जाते है। ये लोकगीत बहुत ही प्रसिद्ध है। जो इस प्रकार है:
. काँच ही बाँस के बहंगिया , बहंगी लचकत जाए
. केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय
. उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर
. हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।
. चार कोना के पोखरवा

बिहारियों की पहचान है छठ पूजा :
छठ पूजा वैसे तो देश के कई हिस्सों में मनाया जाता है,लेकिन खासतौर पर यह पर्व बिहार में बहुत धूम- धाम से मनाया जाता है। जिस वज़ह से इसे बिहार के लोगों के पहचान के रूप में देखा जाता है।
2008 के आस- पास शिवसेना नेता राज ठाकरे ने इस पर्व को एक प्रकार के शक्ति प्रदर्शन का नाम दिया था और शिवसेना के कई नेताओं ने इस पर्व का विरोध भी किया था। जिसे बिहारी लोग अपने अस्मिता से जोड़कर देखने लगे तथा देश के हर कोने में जहाँ भी बिहारी रहते है,उन्होंने  इसका पुरजोर विरोध किया।

– आकांक्षा कुमारी की रिपोर्ट

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