तलाकशुदा औरतों का चरित्र-चित्रण : Dear, You’ll be Judged

भारत एक विकसित होता हुआ देश है और यह साल 2020 है। जहाँ स्वतंत्र महिलाओं की पीढ़ी और करियर केंद्रित होने का दावा किया जाता है, वहीं आज भी इससे देश की कुछ परंपराएं है जो कि आश्चर्यजनक हैं। जैसे कि लड़कियों का पाश्चात्य पहनावा, शराब – सिगरेट पीने पर उनका चरित्र चित्रण और तलाक होना। भारत मे तलाक होने पर या लड़कियों के सिंगल रहने के फ़ैसले पर, समाज को बड़ी परेशानी है; यहाँ तलाक एक निषेध है। जैसे सिगरेट के डिब्बे पर लिखा होता है ‘Tobacco Kills’ वैसे शायद तलाक के कागजातों पर लिखा होना चाहिए ‘You’ll be Judged’.

तलाक की सबसे सरल परिभाषा क्या हो सकती है? उस व्यक्ति से दूर होना, अपने रिश्तों को समाप्त कर लेना – जिसने आपको लंबे समय तक परेशान किया है या जिनके साथ आप खुश नहीं हैं।फ़िर इस पितृसत्तात्मक समाज को किसी व्यक्ति के निजी कारणों को बिना जाने – समझे उनके तलाक के फ़ैसले को ग़लत कैसे ठहरा सकते हैं?
पूरे विश्व में सबसे कम दर तलाक भारत में होते हैं। केवल एक प्रतिशत भारतीय विवाह ही समाप्त होते हैं – और यह आंकड़ा शहरी और मेट्रो छेत्र तक सीमित है। आम तौर पर समाज इन आंकड़ों पर गर्व करता है पर शायद उन लाखों महिलाओं की घुटन को भी अनदेखा करता है जो अपने विवाहित जीवन से खुश नहीं हैं। यहाँ ‘खुश नहीं’ की क्या परिभाषा है? अक्सर हमने अपने आसपास औरतों को पीटते देखा है, उन्हें किसी प्रकार के आर्थिक या मौलिक आवश्यकताओं के लिए अपने पति से गिड़गिड़ाते देखा है, उन्हें गालियां दी जाती हैं, उनसे दासियों जैसा बर्ताव किया जाता है, उनके स्वाभिमान को ध्वस्त किया जाता है आदि ; और इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि ऐसी महिलाओं का आंकड़ा 1 प्रतिशत से तो कहीं ज्यादा है।

इसके अनेक कारण हैं। वुमन वेब के लेख में तलाक की वकील अलीशा परेज कहतीं हैं कि ‘दरें शायद इसलिए कम है क्योंकि कई शादियां पंजीकृत नहीं है। छोटे शहर और गांव के लोग शादी पंजीकृत नहीं होने की वजह से तलाक के कानूनी मसलों में नही पड़ते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें तलाक के बाद जीवन यापन के लिए कोई सहायता नहीं मिलेगी। कुछ तलाक परिवार और समाज के दबाव से नहीं हो पाते।

Courtesy : catch website

अक्सर भारतीय महिलाओं द्वारा अत्याचार को सहते रहना और मुखर होकर विरोध न करने की एक वजह यह भी है कि वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होती और उन्हें अपने पति या ससुरालवालों पर आश्रित रहना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि महिलाओं में साक्षरता दर कम है, पर अक्सर ग्रैजुएशन या पीजी के बाद उनकी शादी कर दी जाती है, इन्हें मार्केट में उतरने और जॉब के लिए ट्राय करने का मौका हीं नहीं मिल पाता। शादी के 5-10 साल के बाद जब उन्हें इसकी जरूरत नज़र आती है तबतक उनका आत्मविश्वास न के बराबर बचता है।

उदाहरण मे एक छोटी सी व्याख्या है जो वुमन वेब के लेख में प्रकाशित है।

राधिका, जिसकी शादी को लेकर समस्याएं थीं, 12 साल तक गुस्से और नखरे को सहने के बाद जब उसे लगा कि शादी मे अब कोई समानता या प्यार नहीं है, तब उसने तलाक का फैसला लिया। हालांकि वो शिक्षित और कार्यरत थी और यह एक आपसी तलाक होता। पर इसके बाद भी उसके माता पिता तलाक को राजी नही हुए।और उसपर सलाहों की झड़ी लग गई जैसे कि ‘हर शादी मे झगड़े होते हैं ,लोग साथ नही रहते क्या?”आदि। इतना ही नही, राधिका के माता पिता मंदिरो का दौरा तक किया ताकि उनकी बेटी का तलाक न हो। राधिका ही नहीं, समाज की अनेक महिलाओं को इसी दौर से गुजरना पड़ता है जब भी वह तलाक के बारे मे सोचती है।

समाज और परिवार के द्वारा तलाक को लेकर अनेक नकारात्मक दृष्टिकोण बनाए गए हैं।

इज्ज़तदार घरों की लड़कियाँ तलाक नहीं करतीं हैं!
समाज द्वारा यह मनोदशा बना दी गयी है कि महिला के आचरण से ही उसके परिवार का सम्मान है।और तलाक ‘सम्मानजनक’ नहीं है। इसलिए उनके परिवार के सम्मान को ठेस पहुँचेगी।

परिवार की प्रतिष्ठा हो तुम!

इसका श्रेय पारंपरिक भारतीय मूल्यों को देते हैं, जो परिवार को व्यक्ति के खुशी से ऊपर रखते हैं।जिनके अनुसार तलाक होने पाए परिवार की प्रतिष्ठा को आंच आती है।

अकेले रहना आसान नहीं:

समाज से यह भी दृष्टिकोण बना दी है कि एक लड़की को हमेशा आदमी के समर्थन की जरूरत होती है। क्यों न हि वो महिला आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो और अपना जीवन यापन कर सकें।

सामाजिक कुरीतियां:
समाज के बनाए दृष्टिकोण के अनुसार तलाकशुदा महिलाओं को महत्वपूर्ण अनुष्ठानो से दूर रखा जाता है क्योंकि भारतीय समाज मे ‘सुहागनों’ को उच्च दर्जा प्राप्त है और उनको ही समाराहों मे महत्व दिया जाता है।

पुर्नविवाह और चरित्रहीनता :
हालाँकि समाज ने बहुत हद तक पुर्नविवाह का मान लिया है। परंतु तलाक के बाद ‘एक बच्चे के साथ’ पुर्नविवाह करना , समाज की दृष्टिकोण से लड़की की बुरी चरित्र को दर्शाता है।

इन सब का निष्कर्ष यह निकलता है कि महिलाओं आर्थिक स्वतंत्रता, शहरीकरण और सामाजिक भूमिकाओं मे बदलाव के बावजूद, तलाक भारतीय समाज के लिए अभी भी एक कलंक के समान है। समाज, तलाक को नकारात्मक दृष्टिकोण से देखता है जबकि यह दो लोगों के जीवन और खुशहाली के लिए एक सकारात्मक निर्णय है।

Reference :WomenWeb
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By, Tanvi Tanuja

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