आज चुनाव का दूसरा चरण,नितीश के विफलताओं पर एक्शन लेगा बिहार या जंगल राज याद करके देगा एक और मौका

बिहार में विधानसभा चुनाव का आज दूसरा चरण है। चुनाव की तैयारी को लेकर तमाम पार्टियों ने बहुत से वादे और रैली किये। इस बीच वादें- प्रतिवादें के दौर में राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे पर सवाल खड़ा करते हुए नजर आये। पिछले 15 वर्षों से सत्ता में काबिज नीतीश सरकार इस चुनाव को नीतीश के 15 साल बनाम लालू के 15 साल के मुद्दे पर लड़े। वहीं राजद परिवार नीतीश सरकार पर हमला करते हुए इसे बिहार सरकार का जुमला बताया और शिक्षा,स्वास्थ और बेरोजगारी के मुद्दे पर घँसीटा।

बिहार में चुनाव मुख्य रूप से NDA बनाम महागठबंधन का रूप लिया जहाँ चिराग पासवान और पुष्पम् प्रिय चौधरी जैसे युवा नेता भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हुए नज़र आये। एनडीए की ओर से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के दावेदार हैं। पर सवाल उठता है कि आखिर 15 सालों से बिहार की सत्ता संभाल रहें नीतीश कुमार को जनादेश क्यों मिले? क्या नीतीश सरकार को बिहार के सर्वभौमिक विकास के लिए 15 साल कम थे?

बेशक लालू के कार्यकाल का जंगल राज देखने को नही मिला, बिजली और सड़क व्यवस्था पहले से बहुत सुदृढ़ हुई पर क्या इतना काफी है? 15 साल पहले बिहार की स्थिति पैदल यात्री जैसी थी पर आज विकास के नाम पर साइकिल मिली है । 

जानते हैं कि सुशासन बाबू के 15 साल के कार्यकाल का हाल क्या था? ऐसा क्या हुआ कि आज तक बिहार विकास की लकीरों से कोसो दूर खड़ा है?

वैसे तो इतिहास के पन्नों में बिहार मगध साम्राज्य का अभिन्न अंग हुआ करता था, जिसे खजानों की राजधानी के रूप में जाता था। पर लूट का सिलसिला ऐसा था कि आक्रांता और अंग्रेजों ने भारतीय व्यवस्था को खोखला कर दिया था। 1947 में आजादी मिलने के बाद जब देश के सभी राज्यों को अपने मुख्यमंत्री मिले ताकि मौजूदा हालात को मजबूत बनाया जा सके। बिहार को भी श्री कृष्ण सिंह के रूप में पहले मुख्यमंत्री मिले, लगभग 58 साल बाद जब 2005 में नितीश कुमार के रूप में मुख्यमंत्री मिला तो बिहार में बहार की आशाएं उभरी थीं।

करीब 15 साल बाद बिहार की व्यवस्था पर नजर डालें तो हालात आज भी जर्जर है। पिछले 15 वर्षों में तमाम ऐसे मुद्दे हैं जो बिहार की स्थिति को सामने रख देते हैं। चाहे वह शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य, आर्थिक या आपदाओं से निपटने की बात हो।

ऐसे 10 मुद्दे जो बिहार की गतिशीलता को दर्शाते हैं:

1.एग्जाम में चीटिंग वाला वायरल तस्वीरBihar cheating viral photo

वह दृश्य तो आपको याद ही होगा कि जब बिहार में मैट्रिक और इंटर की परीक्षाएं कराई जाती हैं तो परीक्षा से पहले छात्रों को प्रश्न उत्तर मिल जाते हैं। एग्जाम सेंटर के चारों ओर चीट की उपलब्धता यह दर्शाता है कि बिहार की व्यवस्था सिर्फ औपचारिकता सी रह गई है। इस तस्वीर के वायरल होने पर वैश्विक स्तर पर बिहार सरकार कि आलोचना हुई थी और देश विदेश में रह रहे बिहारी लोगों को शर्मिंदा होना पड़ा था। 

2.बिहार के टॉपर

रूबी राय ,जी हां वही लड़की जिसने बिहार टॉप(आर्टस् ) किया था। पॉलिटिकल साइंस को प्रोडिकल साइंस कह कर विवादों में आने वाली बिहार इंटर परीक्षा कि आर्ट्स टॉपर रूबी राय की दास्तां बिहार के सिस्टम की कहानी बयां करती है। इतना बड़ा घोटाला बिहार के सुशासन बाबू के बिहार में बहार वाला एक महत्वपूर्ण सबूत है।

3.सुशासन व्यवस्था

यह दावा किया जाता है कि नीतीश सरकार में भ्रष्टाचार, रेप, मर्डर और डकैती के केस कम हो गए हैं, पर आंकड़े सुशासन बाबू के पोल खोल कहानी को दर्शा रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक देशभर के 19 मेट्रोपोलिटन शहरों में होने वाली हत्याओं में पटना पहले स्थान पर हैअपराध के मामले में बिहार पांचवे स्थान पर है। वहीं हनीमून किडनैपिंग और दंगे की बात की जाए तो कर्मश: दूसरे और पहले स्थान पर काबिज है। आए दिन बलात्कार के केस में बढ़ोत्तरी सुशासन व्यवस्था के लचर होने का अहम उदाहरण है।

4.स्वास्थ्य व्यवस्था

नीतीश सरकार का यह दावा है कि बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था सही है, पर आंकड़े के मुताबिक 17650 व्यक्ति पर महज एक डाक्टर हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से तय मानक प्रति हजार आबादी पर स्वास्थ्य केंद्र में बिहार सबसे आखिरी पायदान पर है। बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था का लचर उदाहरण हर साल चिमकी बुखार से मरने वाले बच्चों से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल जिसे बिहार का सबसे बड़ा स्वास्थ्य केंद्र माना जाता है, पर सैकड़ों मासूम बच्चों की हर साल मौत का गुनहगार बना यह हस्पताल बिहार की नीतीश सरकार के स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल बयां करता है।हालाँकि हाल हीं में वहाँ एक बड़ा अस्पताल बनाया गया है। वहीं covid 19 के दौरान बिहार में त्राहिमाम की स्थिति उत्पन्न हो गई और अस्पतालों में बेड और टेस्टिंग की भरी किल्लत देखने को मिली। #testingbadhaobiharbachao (टेस्टिंग बढ़ाओ बिहार बचाओ) जैसे हैशटैग ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा था केंद्र से आये टीम ने भी व्यवस्था की पोल खोल दी थी। 

5.बाढ़ का कहर

Patna flood 2019 pics
तस्वीर सभार :ANI

प्राकृतिक आपदा में किसी का हाथ नहीं होता पर बिहार में आने वाली आपदाओं में कहीं न कहीं सरकारें जिम्मेदार रहीं हैं। बिहार में गंगा, कोसी और सोन नदी का पानी बाढ़ का कारण बन जाता है। पर पिछले साल आई बाढ़ में राजधानी पटना का डूब जाना सरकार की नाकामियों को पेश करता है। शहर के सभी नाले जाम होने के कारण पानी का बाहर ना निकलना पटना में बाढ़ का कारण बना था, जिसमें लाखों का नुकसान हुआ था। पटना की मेयर सीता साहू से जब सवाल किया गया तो उन्हे ये तक मालूम नही था की यहाँ कितने संप हाउस हैं और नालों का नक्शा क्यों गायब है।हालांकि यह सिलसिला हर साल का है। बांधे, नदियों का गहरा ना होना इन सब के पीछे सरकार जिम्मेदार है। वहीं कचड़ा सड़क पर फेंकने के लिए आम जन की भूमिका है जो निंदनीय है। 

6.बालिका गृह कांडBrajesh thakur balika grih kand

बालिका गृह वह स्थान है जहां अनाथ, बेसहारा बच्चों को रखा जाता है और उनकी देखभाल की जाती है। बिहार में ऐसे कई सारे केंद्र हैं। इन केंद्रों में से मुजफ्फरपुर बालिका गृह में बच्चियों के साथ यौन संबंध बनाए जाते थे। साथ ही उन्हें नशीली पदार्थ और दवाइयां दी जाती थीं। नितीश सरकार के अधिकारियों तक इन लड़कियों को पहुंचाया जाता था। इन सब के सरगना बृजेश ठाकुर था, करीब 40 लड़कियों के साथ सेक्स रैकेट का धंधा नीतीश सरकार के नाक के नीचे सरकार की शासन व्यवस्था के नकारात्मकता का संकेत था।

7.शिक्षक बहाली और स्कूल के हाल

तस्वीर सभार: oxfam India

बिहार के शैक्षणिक आंकड़े भी लचर है। बता दें कि लगभग ढाई लाख की संख्या में शिक्षक के पद खाली पड़े हैं। स्कूलों में भवन जर्जर है और पिछले 15 वर्षों की बात करें तो सरकार सिर्फ भूमिका बनाकर काम कर रही है।

8.पलायन

Migrant labours Bihar
तस्वीर सभार : PTI

नीतीश सरकार के विकास के तमाम वादे कोरोना महामारी के दौरान पलायन का सिलसिला देखने के बाद खोखले नजर आ रहे हैं। लाखों की तादाद में मजदूरों का दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों से वापस बिहार लौटना यह साबित करता है कि बिहार में रोजगार की स्थिति दयनीय है। तभी तो हर साल तकरीबन 45 से 50 लाख लोग पलायन करते हैं। जानकारों की मानें तो बिहार की इंडस्ट्रियल पॉलिसी आज भी बदतर स्थिति में हैं।

9: कोरोना से सामना

मौजूदा वक्त की बात करें तो पूरा विश्व कोरोना महामारी की जद में फंसा हुआ है। वहीं बिहार की बात करें तो कोरोनावायरस का कहर बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल सामने रख देता है। चाहे अस्पतालों में मौजूद कीट हो, बेड हो या फिर सरकारी दवाइयां हों। इन सबकी कमी के कारण आज बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था आईसीयू में चली गई है। कोरोना काल के दौरान चाहे मास्क, सेनीटाइजर या कोरोनटाइन सेंटर पर लोगों की व्यवस्था की बात हो,इन सब में सरकार फेल नजर आई है। बता दें कि बिहार के अस्पतालों में कोरोना पेसेंट के रिपोर्ट आने में लगभग 10 दिन लग जाते थे। 

10. आर्थिक स्थिति

किसी भी राज्य की दृढ़ इकाई उसकी आर्थिक परिस्थिति पर आंकी जाती है, जो रोजगार के बढ़ते आशाओं पर निर्धारित होता है पर बिहार की बात करें तो पिछले 4 वर्षों में युवाओं में बेरोजगारी 3 गुना बढ़ी है। NSO के रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 की तुलना में 2017-18 में बिहार में रोजगार की स्थिति दयनीय है।

गौरतलब हो कि बिहार सरकार इन सभी आंकड़ों के परे मौजूदा चुनाव लालू के 15 साल या नितीश के 15 साल के मुद्दे पर लड़ रही थी। अब 10 नवंबर को नतीजे आयेंगे और उसी से फैसला होगा की क्या जनता नितीश सरकार को एक और मौका देती है या बिहार बदलाव के मूड में है। नतीजे जो भी हों, पर लोकतंत्र के इस महापर्व में बिहार का माहौल कुछ अलग हीं रहा। 

– अभय कुमार सिंह और शुभम कुमार की रिपोर्ट

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