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परिचय देने  के कई तरीके हो सकतें हैं। सीधे मुद्दे पर आया जा सकता है, शेर-ओ-शायरी से शुरुआत हो सकती है या फिर कुछ और।

आपसे विनम्र आग्रह है कि एक बार उन सभी ख़बरों – कहानियों और सोशल मीडिया के पोस्ट के फ्लैश बैक में जाएँ, जिन्हें आज आपने पढ़ा – देखा है। बेशक, सभी तो नहीं पर अधिकांश ऐसे होंगे जो किसी विशेष विचारधारा / प्रोपेगेंडा के वाहक और जननी होंगे। और जाने अनजाने में हीं सही हम उन ख़बरों के निर्माताओं के फैन होते चले जातें हैं। किसी एक विचारधारा का अनुयायी होने या न होने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सबमें सोचने समझने की क्षमता है और यह उनका मानवाधिकार भी है कि वह क्या सोचें/पालन करें और क्या नहीं।

पर वैचारिक विध्वंस वहाँ से शुरू होता है जब मीडिया यह तय करने लगे कि ‘सिर्फ़’ क्या सोचना है और ‘सिर्फ़’ क्या नहीं सोचना। यह आपदा तब और भी विनाशकारी होती चली जाती है जब हमारी पूर्व अवधारणाएं इससे हवा देने लग जातीं हैं। मीडिया का यह दायित्व है वह तथ्यों को आसान भाषा में जन जन तक पहुंचाए, लोगों को उन बातों से अवगत करवाए जो उनके सामने तो है पर कहीं न कहीं ध्यान केंद्रित न हो पा रहा हो।

अक्सर वाद – विवाद के दौरान यह देखने को मिलता है कि प्रतिभागी दो विशिष्ट भागों में बंट जाते हैं और अंत में परिणाम कुछ न आते हुए उसी दुविधाजनक मोड़ पर आ जाती है जहां से शुरुआत की गई थी। राइट और लेफ्ट, पक्ष और विपक्ष, समाज और संस्थान आदि सभी के विचार चिंतनीय होते हैं, एक सिरे से इन्हें नकार देना थेथरलॉजी के दायरे में आ सकता है। अब मीडिया तो अपना स्टैंड बदल नहीं सकती, बदले भी कैसे? आख़िर वर्षों लगे हैं उन्हें वो मुखौटा बनाने में, जो वह धारण करके आप तक ख़बरें पहुंचाते हैं। अतः वह ‘अपना वाला’ पक्ष उठाते हैं और परोस देते हैं, जनता भी मज़बूर, उसे उठा लेती है।

इसी तंत्र के विपरित दि ग्रे इंडिया मुखर होकर तथ्यात्मक रूप से यह बताएगा की कैसे हम सही को सही और ग़लत को ग़लत बोल सकते हैं। हम सराहना और निंदा, सवाल और कटाक्ष, सरकार – विपक्ष के साथ साथ जनता और संस्थानों से भी करेंगे। ख़बरें देने के साथ साथ ख़बर लेना भी हमारी प्राथमिकता होगी। इसके इतर हम निरंतर उन टैबू या ‘ गन्दी बातों’ पर चोट करते रहेंगे जो बेड़ियों की तरह हमारे समाज को जकड़े हुए है।

दो प्रचलित धारणाओं से परे हम वह सच उजागर करने में प्रयासरत होंगे जिससे हमारा समाज जिम्मेदार और चिंतक के तौर पर बेहतर ढंग से उभरे। खबरों का स्टार्टर देकर हम आपको भूखा नहीं छोड़ेंगे, हमारा यह दायित्व होगा कि मेन कोर्स, ऐपेटाईज़र और डेज़र्ट का लुत्फ़ भी आप उठाते जाएँ। अतः ख़बरों के प्रारंभ – मध्य और अंत की कड़ियां हम ज़रूर जोड़ेंगे। हम उन कहानियों – ख़बरों को भी आप तक पहुँचाने के लिए अग्रसर होंगे जो कहीं पीछे छूट चुके हैं या कहें की  ढक दिए गए हैं। बताने को तो अब भी बहुत कुछ है , ख़ैर कहने – सुनने के अभी बहुत से मौके आते रहेंगे, तब तक के लिए बस इतना हीं।

– दि ग्रे इंडिया डेस्क

“पत्रकारिता वह छापना है जो कोई अन्य न छपने देना चाहता हो। इसके अलावा सब जनसंपर्क हैं।”   – जॉर्ज

वेल 

 

“Journalism is printing what someone else doesn’t want printed. Everything else is public relations.”

– George Orwell